तोड़ के सूरज का टुकड़ा, ओप में ले आऊं मैं! हो जलन हांथों में, तो क्या! कुछ अँधेरा कम तो हो. -मीत

ए ज़िन्दगी तू यूँ ना गुज़र अभी...











ए ज़िन्दगी तू यूँ ना गुज़र अभी...
तय करना है लंबा सफर अभी...
साया भी छोड़ जाता है, जब रात आती है,
रात ना कर, रहने दे सहर अभी...
चले जा रहे हैं हम, तन्हा ही मंजिल की तरफ,
धुंधला जाती है मंजिल, तू अँधेरा ना कर अभी...
ए ज़िन्दगी तू यूँ ना गुज़र अभी...
रोशन है तू तो, चले जाता हूँ मैं,
राह में कितनो से ही आगे निकल जाता हूँ मैं...
ठोकर खा जाऊंगा, गर दिखेगा नहीं कुछ,
रहम ना कर, पर कर ले फ़िक्र अभी...
ए ज़िन्दगी तू यूँ ना गुज़र अभी...
धड़कनों की धक-धक में,
हो रही है मौत की पदचाप...
पर सुनने नहीं देता है इसे,
तेरा ही तो स्वर अभी...
ए ज़िन्दगी तू यूँ ना गुज़र अभी...
तय करना है लंबा सफर अभी...

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

माँ के हजार रूप...

हर इंसान के जीवन में माँ का एक महत्वपूर्ण स्थान होता है! कुछ लोगों के लिए माँ ही जीवन होती है तो कुछ लोग माँ को भगवान का दर्जा देते हैं...मेरे भी जीवन में मेरी माँ का अहम् स्थान है...जो आतंकवादी दिल्ली में बम ब्लास्ट के आरोप में पकडे गए हैं। वो आतंकवादी हैं या नहीं ये बात पूरेविश्वास से कह पाना जरा मुश्किल है! या तो भगवान जानता है की वो गुनाहगार हैं और या फ़िर वो आतंकवादी ख़ुद...
उन्हीं में से एक आरोपी की माँ का इंटरव्यू टीवी पर देखा और कई जगह पढ़ा भी जिसे पढ़ और देख कर मेरी ऑंखें नम हुए बिना ना रह सकीं।
ऑफिस में इसी को लेकर बात चल रही थी, तो किसी ने मुझसे कहा की माँ तो ऐसी ही होती है, चाहे उसका बेटा कितना भी बुरा हो। वो हमेशा अपने बेटे का ही पक्ष लेती है...
मुझे पता नहीं ये बात क्यों अच्छी नहीं लगी, क्योंकि जहाँ तक में अपनी माँ को जनता हूँ, वो तो बिल्कुल ऐसी नहीं हैं... और आप लोगो को याद होगी फ़िल्म मदर इंडिया! कहने को तो ये सिर्फ़ फ़िल्म है, लेकिन उसमे एक माँ के जज्बातों का नया रूप लोगो के सामने आया था, इसीलिए फ़िल्म ओस्कर तक पहुंची थी...जब मैंने अपने सहकर्मचारियों से कहा की नहीं हर माँ ऐसी नहीं होती, तो वो मेरी बात का मजाक उड़ाने लगे.
दुनिया में बहुत सी ऐसी माँ हैं जो वक्त पढने पर अपने बेटे को भी सजा देने से नहीं चूकेगी।
शायद इसी बात को लोगो को बताने के लिए फ़िल्म मदर इंडिया का निर्माण हुआ था...
मेरी माँ भी किसी मदर इंडिया से कम नहीं है, वो मेरे खाने, पीने, सोने हर छोटी से छोटी चीज का ख्याल रखती हैं, वो मेरी हर बात जानती हैं, मैं कब क्या कर सकता हूँ, कब क्या नहीं, किस चीज से नफरत हैं, किस चीज से प्यार सब कुछ जानती हैं... कई बार में माँ से कुछ छिपा रहा होता था तो वो सच बात बोल देती थी और में मन ही मन हैरान हो जाता था की माँ ने मेरे मन की बात कैसे कह दी...
एक बचपन का वाक्या आपसे बाँटना चाहूँगा। मैं चान्दिनी चौक के दरीबा के एक स्कूल में नर्सरी क्लास में पढता था, बहुत छोटा था. एक दिन स्कूल के किसी बच्चे का जन्मदिन था उसके पापा ने पूरे स्कूल को ज्योमेट्री बॉक्स बांटा। मुझे भी मिला में खुशी फुदकता हुआ घर पहुँचा और माँ को वो बॉक्स दिखाया। देखते ही मेरी माँ पूछती है की कहाँ से लाया? मैंने कहा की सबको मिला है किसी का जन्मदिन था, उसके पापा ने बांटा है...पर माँ को लगा की मैं चोरी कर के ले आया हूँ, उन्होंने कहा सच बता दे... अब उन्हें कौन बताता की मैं सच ही तो कह रहा था। माँ ने मेरी एक नहीं सुनी और मुझे खूब पीटा और कोठरी में बंद कर दिया। कोठरी घर का वो कमरा था जिसमे हम कबाड़ और टूटी-फूटी चीजे रख देते थे। मैं रोते -रोते कहता रहा की माँ मैंने चोरी नहीं की। पर माँ ने मेरी नहीं सुनी। अगली सुबह माँ मुझे और उस ज्योमेट्री को लेकर मेरी क्लास टीचर के पास पहुँची और उनसे बोली की देखो ये मेरा बेटा किसी की ज्योमेट्री उठा ले गया है। तब टीचर ने उन्हें बताया की नहीं ये इसी का है. और टीचर से सच पता चलने के बाद माँ की आँखों में आंसूं आ गए और उन्होंने मुझे गले से लगा लिया...और घंटों प्यार करती रहीं...
खैर जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ मेरी माँ मुझे पूरी तरह जान गई। पर मैं उन्हें आज तक अच्छी तरह जान नहीं पाया हूँ।
अभी इस लेख को लिखने से पहले मैंने माँ को फोन किया ये पूछने के लिए की मैं उस वक्त कौन सी क्लास में था, क्योंकि मुझे ठीक से याद नहीं था... तो माँ ने पूछा की क्यों पूछ रहा है? मैंने कहा ब्लॉग पर डालूँगा तो बोली- पागल और फोन रख दिया....
सच में माँ दुर्गा भी है और काली भी उसके हजार रूप हैं....
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भारत का दामाद, आतंकवाद!










कल राह में मिल गया,
मुझे आतंकवाद!
मैंने पूछा?
क्या हाल है, नेताओं के बाप?
बहुत अरसा हो गया है,
तुमको भारत में आये...
क्यों ना कुछ दिनों के लिए,
कहीं और चला जाये...
आतंकवाद बोला-
अरे नासमझ!
में नेताओं का बाप नहीं,
उनका पति हूँ...
तेरी सरकार है, मेरी रखैल!
और भारत है मेरी ससुराल!
भला अपनी ससुराल को,
कोई ऐसे भी छोड़कर जाता है?
मैं कभी ना जाऊंगा...
तुझ जैसो की छाती पे चढ़कर,
खूब उत्पात मचाउंगा!
कर ले जो कर सकता है!
पर सुन ले की,
भारत की सरकार मुझे
दामाद बनाकर यहाँ लाई थी!
अबतो यहाँ से मेरी अर्थी ही जायेगी...

मेरी गुजारिश है, मेरे ब्लॉग को पढने वाले हर इंसान से आओ! इस आतंकवाद नाम के दामाद को अर्थी पे लिटाकर अपनी सरकार को बेवा कर दें...जबतक हमसब कुछ नहीं करेंगे तबतक ये नेताओं का पति और भारत का दामाद ऐसे ही उत्पात मचायेगा...तो क्यों नहीं हम खुद ही इस उत्पात को रोकें? क्यों आप सब मेरे साथ हैं ना...आतंकवाद की अर्थी उठाने के लिए...

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एक सच ये भी है...

शनिवार की शाम को कनाट प्लेस के सेंट्रल पार्क का मंज़र देख दिल बहुत उदास था, रविवार को ऑफिस की छुट्टी थी। मन घर में नहीं लग रहा था, तो सोचा की थोड़ा बहार टहल आता हूँ। घर के सामने ही मेट्रो स्टेशन है सोचा वहीँ सीढियों पर बैठ जाऊं आते-जाते लोगों को देखूँगा तो शायद मन बहल जाए। पर वहां सन्नाटा पसरा था। आदमी का नामोनिशान ना था। मुझे पता चला की मेट्रो बंद है...
खैर! मैं अपने मुहल्ले की गली के बाहर आकार खड़ा हो गया।
काफी देर तक खड़ा रहा, गली के बाहर बहुत से ठेले-खोमचे वाले खड़े थे। जिनमे मूंगफली, नमकीन, जलेबी और तीन ठेले अंडो के थे। ये तीनो अंडे की रेहडी लगाने वाले हमारी गली में ही रहते हैं।

एक अंडे की रेहडी लिए हमारी गली के दायीं ओर एक ११-१२ साल का लड़का खड़ा था। ये भी हमारी गली में ही रहता है। सुबह स्कूल जाता है, दोपहर को घर का काम और शाम को अपना और शायद अपने परिवार का पेट पालने के लिए लोगो को ओम्लेट बना-बना कर खिलाता है। अबसे कुछ साल पहले उसके पिता की एक गोली खाने के कारन मौत हो गई। सुना था की उसके पापा ने कोई गोली खाई, उन्हें उलटी आयी और बस ज़िन्दगी खत्म।
इससे पहले वो ठेला उसके पापा ही लगाते थे। बम फट जाने की वजह से सड़क बिलकुल सुनसान थी बस इक्का-दुक्का आदमी ही थे.उस लड़के का नाम कालू है. कभी-कभी उसे देखकर ऐसा लगता है की जैसे उसका बचपन किसी अंधकार में समाता चला जा रहा है. खेलने कूदने की उम्र में वो पेन में ओम्लेट को उछालता है...
मैं उसे ओम्लेट बनाते देख रहा था। ना जाने कब उस लड़के की रेहडी पर दो युवक चुपचाप आकर शराब पीने लगे थे, जिसका पता शायद उसे भी ना चला था...थोडी देर बाद ही एक पुलिस वाला वहां आया और सभी से बोला की की चलो भाई रेहडी लेकर चलो...जो दो अंडे की रेहडी वाले थे वो बोले की हमारा तो चालान कट चूका है... पुलिस वाला अपने मुँह को सडाने लगा, जैसे की उसके हाथ में आने वाली लक्ष्मी उसके हाथ से नक़ल गयी हो.उन रेहडी वालो को इंकार कर वो उस लड़के की तरफ बढ़ गया...
वहां उन लड़को शराब पीता देख उसे जैसे मुराद मिल गयी हो...वो उस जरा से बच्चे को गन्दी-गन्दी गलियां देकर जलील करने लगा... और रेहडी अपने साथ लेकर चलने को कहने लगा..लड़का अंकल जी... अंकल जी... मुझे नहीं पता ये लोग कब आकार शराब पीने लगे कहता रहा... लेकिन वो पुलिस वाला बहरा हो चूका था...
तभी तो उसे वो धमाके भी सुनायी ना दिए थे जो एक दिन पहले हुए थे और ना ही सुने दे रही थी उस लड़के की गुहार....
(तस्वीर उसी बच्चे कालू की है)
आगे की बात मैं आपको बताना नहीं चाहता...
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मेरे वतन में कौन आग लगा रहा है...

जहाँ देखता हूँ, दहशत नजर आ रही है। लोग एक डर के साये में जी रहे हैं। परसों की शाम से, देखते ही देखते चंद छुपे हुए चेहरे खुशियों के रंग को चुरा कर ले गए
आज कुछ लिखने का मन नहीं है। दो दिन से बस उदासी छाई है...
समझ नहीं आ रहा है की आखिर हो क्या रहा है...
किसिलिये हो रहा है...
कौन कर रहा है...
क्यों कर रहा है...
उसे आखिर चाहिए क्या...
आखिर वो ऐसा करके साबित क्या करना चाहता है...
मासूमो की जान से खेल कर क्या मिल रहा है उसे...
दिल से बस एक रुलाई निकल रही है...
भारत माँ का आँचल,
उसी के बच्चों के लहू से रंगा जा रहा है...
कौन मेरे वतन में,
आग लगा रहा है...
जिस तरफ देखूं बारूदी फिजा है...
सिसकियों से भरी सारी हवा है...
क्यों खुशिया बदल रही,
मातम में...
क्यों उजाला अँधेरे के,
मुहं में समां रहा है...
कौन मेरे वतन में आग लगा रहा है...

दो दिन से मन बहुत उदास है। आँखों के आगे सेंट्रल पार्क का मंजर घूम रहा है...
बस बहुत हो गया अब सहा नहीं जाता...
इश्वर से दुआ है की वो कुछ करे...

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चलो एक ऐसा गीत लिखा जाए...











चलो एक ऐसा गीत लिखा जाए...
जिसे गाकर हर दिल में प्रेम उमड़ आए...
ना हो धर्म और जात के बंधन,
बस एक ही लहर में हर कोई बहता जाए...
चलो एक ऐसा गीत लिखा जाए...
माँ-बाप का अपने बेटों पे राज हो,
हो कुछ ऐसा के बेटी पे नाज़ हो,
बंजर ज़मीं पे पैदा हो हरियाली,
विधवाओं के मस्तक पर फ़िर से फैले लाली,
मन्दिर में हो अजान,
और मस्जिद में आरती गाई जाये...
चलो
एक ऐसा गीत लिखा जाए...

किसी के दामन में दाग ना हो,
किसी मासूम का जिगर चाक ना हो,
हर तरफ हो प्यार का उजाला,
नफरत की काली रात ना हो,
गरीब के फटे लिबास पे,
अमीर पैबंद लगाये...
चलो एक ऐसा गीत लिखा जाए...
जिसे गाकर हर दिल में प्रेम उमड़ आए...

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सोचा था की आज तुझे ख़त लिखूं...












सोचा है आज तुझे ख़त लिखूं...
बिन तेरे कैसे गुजर रहा है, वो वक्त लिखूं...

आज लिखूं की सुलग रहे अरमानो में,
कैसे ज़हरीले नश्तर चुभ रहे हैं,
गम की काली रात में ये बेबस आंसूं,
थम रहे हैं, थम-थम के बह रहे हैं...
सोचा है आज तुझे ख़त लिखूं...
बिन तेरे कैसे गुजर रहा है, वो वक्त लिखूं...

दिल कर रहा है तुझे भूलने की प्रार्थना
और हम तेरे लौट के आने की दुआ कर रहे हैं,
किस तरह तेरे मेरे अफसाने में,
नाम तेरा लेकर लोग हंस रहे हैं,
बदनाम कर रहे हैं रूह के एहसास को,
तेरी चाहत पे इल्जाम गढ़ रहे हैं,
और हम हैं की बस बुत बने,
बेरहम वक्त की हर चोट सह रहे हैं...
सोचा है आज तुझे ख़त लिखूं...
बिन तेरे कैसे गुजर रहा है, वो वक्त लिखूं...

काश! तू आ जाए तो,
इस जलते हुए दिल को तेरे सीने के तले
ढेर सा आराम मिले,
तेरी बाँहों में सिमट जाऊँ में,
जिस्म के हर एक ज़ज्बात को,
फ़िर से कोई मकाम मिले...
पर...
ये ख़त कौन ले जाएगा तुझ तक...
खो जाएगा ये तो कहीं...
अजनबी राहें हैं, बेनाम सी गलियां हैं,
और तुम ना जाने कहाँ हो?
कौन देगा तुम्हारे आने की ख़बर मुझको...
आह!
सोचा था की आज तुझे ख़त लिखूं...
बिन तेरे कैसे गुजर रहा है, वो वक्त लिखूं...

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मैं हूँ नटखट अंश तुम्हारा...

भीगे कपड़ों से गिरती,
पानी की बूंदों में दिखता है अक्स तुम्हारा...
मन के हर कोने में,
रचा-बसा है वो स्नेहिल स्पर्श तुम्हारा...
माँ तुम तो धरती पे खुदा हो,
और मैं हूँ नटखट अंश तुम्हारा...
गिरा हूँ जब-जब मैं कहीं,
तुमने ही तो थामा,
बनकर चली हो हर लम्हा, हर घड़ी,
तुम्हीं तो मेरा आसमां...
जीत का सबब बनीं तुम,
में जिस क्षण भी हारा...
माँ तुम तो धरती पे खुदा हो,
और मैं हूँ नटखट अंश तुम्हारा...
जीवन के हर कदम पे,
संभाला है तुमने,
अपने आँचल तले,
मुझको पाला है तुमने,
जीवन भर देती रहना,
मुझको अपना सहारा...
माँ तुम तो धरती पे खुदा हो,
और मैं हूँ नटखट अंश तुम्हारा...
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चौराहे पे, धरती माँ के गिर्द, एक नंगा बच्चा लेटा है...












तुम रेशम के आंचल में हो,
वो बिन ढांके ही लेटा है,
चौराहे पे, धरती माँ के गिर्द,
एक नंगा बच्चा सोता है...

मैं देख रहा हूँ, तुमको भी!
मैं देख रहा हूँ, उसको भी!
तुम स्वस्थ, सुसज्जित, सुंदर हो,
वो माटी पुता-पुता सा है...
चौराहे पे, धरती माँ के गिर्द,
एक नंगा बच्चा सोता है...

तुम खुशकिस्मत हो, मिली तुम्हें,
माँ की ममता की गर्मी है,
है तार-तार वो कपड़ा भी,
जिसे तन से उसने लपेटा है...
चौराहे पे, धरती माँ के गिर्द,
एक नंगा बच्चा सोता है...

जब रात आयेगी ठिठुरन की,
वो कस लेगा उस कपड़े को,
तुम किट-किट कर पा जाओगे,
अपनी माता के सीने को...
मिलती है माता की बाहें,
तुम्हें सिराहना बनाने को,
वो पत्थर के एक टुकड़े पे,
अपने सर को रख लेता है,
चौराहे पे, धरती माँ के गिर्द,
एक नंगा बच्चा सोता है...
तुम सुख से पलते-बढ़ते हो,
वो तड़प-तड़प दम देता है...
और लोग तब भी यही कहते हैं...
चौराहे पे, धरती माँ के गिर्द,
एक नंगा बच्चा लेटा है...


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