तोड़ के सूरज का टुकड़ा, ओप में ले आऊं मैं! हो जलन हांथों में, तो क्या! कुछ अँधेरा कम तो हो. -मीत

ज़िन्दगी सपनों के टुकड़े ले, सिरहाने पे रोती है...


ज़िन्दगी सपनों के टुकड़े ले, सिरहाने पे रोती है...
घिस रहा बदन, घाव भरता नहीं
रिस रहा आँखों से, लहू रुकता नहीं
उधड़ने लगे हैं, अब ज़िन्दगी के पैबंद,
सीयू इनको तो चुभन होती है...
ज़िन्दगी सपनों के टुकड़े ले, सिरहाने पे रोती है...
सांस गरल बन सीने में थमीं,
सूखती नहीं अब आँखों की नमीं
ज़हर से कड़वे हैं, सच जीवन के,
पियूं  इनको तो घुटन होती है...
ज़िन्दगी सपनों के टुकड़े ले, सिरहाने पे रोती है...
दिल का टुकड़ा खोया कहीं
ढूंढने को छानी है सारी जमीं
पाने को अब कुछ दिल नहीं करता
ये पाती कुछ नहीं सिर्फ खोती है,
ज़िन्दगी सपनों के टुकड़े ले, सिरहाने पे रोती है...

**मीत**
© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

तेरी दुनिया के निराले, दस्तूर हैं...

पता  नहीं क्या लिखा है, बस दिल में आया ओर लिख दिया.. अगर कुछ उल्टा-पुल्टा हो कृपया बेझिझक बताइयेगा..जिससे की मैं सुधार सकूँ...
स्नेह
मीत 


 तेरी दुनिया के निराले,
दस्तूर हैं...
ग़मज़दा चेहरों पे ये कैसा,
नूर है...
खा रहा है गालियाँ, बदनाम हो रहा है,
लोग कहते हैं यही तो,
मशहूर है...
मुह सीये बैठे हैं, दिल में सबके
चोर है...
खिंच रहे हैं गर्त में, कोन सी ये,
डोर है...
फट रहे कानों के परदे,
किसके सीने का
शोर है...
तेरी दुनिया के निराले,
दस्तूर हैं...
क्यों नहीं पहुँचती है दुआ
खुदा तक...
आसमां धरती से क्या हो गया
दूर है...
उठे हुए हाथ भी अब थकन से
चूर हैं...
या खुदा मैं जान लूं, तू मीत  से भी
मजबूर है...
तेरी दुनिया के निराले,
दस्तूर हैं...

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प्यार तुम्हारा मोर पंख सा...


पास नहीं हो दूर हो तुम,
पर बसे हुए हो नयनों में
प्यार तुम्हारा मोर पंख सा,
रखा है मन के पन्नों में

सदा नहीं अब गूंज रही है,
सन्नाटा बोले कर्णों पे
पर गीत तुम्हारे सजल सजल,
शब्द बने हैं अधरों पे

काश कहीं से आ जाते तुम,
कसक मिटाते जन्मों की
साथ बैठ कर बातें होती,
तेरे मेरे सपनो की

धुंधला हैं अब अक्स तुम्हारा
 जीवन के सब वर्णों में
प्यार तुम्हारा मोर पंख सा,
रखा है मन के पन्नों में
                            --मीत


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मन से निकले मुक्तक...

वैसे तो मुक्तक क्या है, उसकी परिभाषा क्या है.. नहीं जानता... बस लिखने को मन किया तो मन के भावों को ही शब्दों में उडेल दिया... उम्मीद करता हूँ आपको पसंद आये... गलतियाँ हों तो जानने की इच्छा रखता हूँ, ताकि सुधार सकूँ...
1

ज़िन्दगी की हर रात को स्वर दिया है
मन-आँगन को गीतों से भर लिया है
गुनगुना रहा हूँ मैं अब प्रेम-गीत
प्रेम ने मन में मेरे घर किया है. 


2

  ना मालूम किस ओर जा रहा हूँ
कौन सा सुख मैं पा रहा हूँ
क्या मैं ही आज का इंसान हूँ

नोच कर इंसानियत को खा रहा हूँ.

3


कलम मेरी फिर डगमगाई है
अपने लिए एक पड़ाव ले आई है
लिखना है कुछ, पर लिखता हूँ कुछ
आज फिर से उंगलियाँ थरथराई हैं. 


4

प्रीत की डोर में बाँध दिया मुझे
रिश्तों के सलीब पे टांग दिया मुझे
पास सिर्फ एक तन्हाई है
क्यों ऐसा जीवन वीरान दिया मुझे.


5

दूर कहीं अब चल पड़ा है मन
नए सफ़र पे निकल पड़ा है मन
टूट कर कहीं बिखर ना जाये
आप अपने से लड़ पड़ा है मन.


"मीत"



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रिश्तों के आँगन में मन, बिखरा पड़ा है...

 रिश्तों के आँगन में मन, बिखरा पड़ा है... 

प्रेम की अलमारी में, कब से इसे बंद किया था,
हर नाते की चाप को, मुस्कुरा के सह लिया था,
संबंधों की गठरी से, टुकडा-टुकडा कर गिर पड़ा है,

रिश्तों के आँगन में मन, बिखरा पड़ा है...

तकिया से मन को, कभी सराहने पे दबा लेता,
बिछौना बना ज़िन्दगी के पलंग पे कभी बिछा लेता,
आज ये ख्वाहिशों की लाठी बन, मुझसे लड़ चला है,

रिश्तों के आँगन में मन, बिखरा पड़ा है...

हाँथ है की, मजबूरियों की जेब में पड़े हैं,
मन के टुकडों को, हम कुचल के चल पड़े हैं,
अंजान प्रेयसी सा, मुहं फेर के पड़ा है,

रिश्तों के आँगन में मन, बिखरा पड़ा है...

                                          ---मीत
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