तोड़ के सूरज का टुकड़ा, ओप में ले आऊं मैं! हो जलन हांथों में, तो क्या! कुछ अँधेरा कम तो हो. -मीत

बारिश

सुबह की नींद जब टूटी,
तो नज़र खिड़की से बाहर गई...
घर के बाहर पीपल के पेड़ के पत्तों पर बारिश की छोटी-छोटी मोतियों जैसी बूंदें चमक रहीं थीं...
पीपल का वो पेड़ मस्ती में झूम रहा था ......अपनी बड़ी-बड़ी विशाल टहनियों को मेरे घर के चारों और फैलाये ...
सुबह-सुबह ऐसा नज़ारा देख कर मन में एक खुशी सी जाग उठी ....
पेड़ के तने से लगकर एक बूढा भी खडा था, साथ में उसकी सायकिल, जिस के करियल पर बंधी थी एक अख़बारों की गठरी...
जिसे वो खुद भीग कर भी गीला होने से बचा रहा था...
शायद इस चिंता में की लोगो तक उसे ये खबरें पहुचानीहै, या फिर इनको बेचने पर जो कमाई होगी उससे अपना घर चलाना है
जो बारिश अब तक मुझे खूबसूरत लग रही थी, अचानक उसका चेहरा कुरूप लगने लगा....
हाँ बारिश से अच्छा वो पीपल का पेड़ लग रहा था...

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