तोड़ के सूरज का टुकड़ा, ओप में ले आऊं मैं! हो जलन हांथों में, तो क्या! कुछ अँधेरा कम तो हो. -मीत

मैंने वो सपना सहेज रखा है...

उनींदी स्याह रातों में...
रिश्तों की उलझी डोर से,
जिसे तुमने बुना था,
वो सपना...
मैंने सहेज रखा है...
हाँ वही सपना...!!
जो तुम्हें जान से प्यारा था..
वही सपना...
जो तुम्हारे मन का सहारा था...
पलकों की चादर फैंक,
आज ये कहीं उड़ जाना चाहता है...
जब रोकता हूँ इसको
तो घंटो छटपटाता है...
ना जाने देना इसको
तुमने ही तो कहा था,
पलकों के किनारे इसको
तुमने ही तो रखा था...
हाँ...देखो ना...
वो सपना
मैंने सहेज रखा है...
© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!
15 Responses
  1. 'पलकों के किनारे इसको
    तुमने ही तो रखा था.

    bahut khoob!
    -yun hi in sapno ko sajaye rakheeye jab tak ye saakaar na hon!
    -dil ke bebasi ko baatati hui bhaav-abhivyakti mein safal kavita.


  2. दिल से निकली हुई दिल को छूती हुई सुन्दर शब्दों से लिखी आपने ये रचना। कहीं बेबसी को भी बयान करती है ये रचना। जो सपने सहज कर रखे हुए वो जल्दी पूरे हो यही दुआ करते है। वैसे फोटो भी सुन्दर लगा रखा है :) एक बेहतरीन पोस्ट।


  3. swati Says:

    jo saheja hai ...wo sapna har prakaar se purnta paaye ye hi meri prarthna hai...bahut hi sundar kavita likhi hai meet bhai...


  4. बहुत खूबसूरत भाव. शुभकामनाएं.

    रामराम.


  5. वाह-वाह क्या बात है। मित्र लाजवाब रचना।बधाई


  6. क्या बात है !!!!!!गजब कहा


  7. बहुत ही खुब है आपके अन्दाजे व्यान .....बहुत ही सुन्दर


  8. jassi Says:

    yeh sapna bhot aacha hai ise u hi sahej ke rakhna aap, behad khubsurat rachna hai.


  9. बहुत सुन्दर.


  10. बेहद खूबसूरत रचना ...


  11. पलकों के किनारे इसको
    तुमने ही तो रखा था...

    डाईरैक्ट दिल से निकली हुई सच्ची आवाज़


  12. कुछ सपने सहेजकर रखे जाने के लिए होते हैं ...अच्छी रचना


  13. जिसे तुमने बुना था,
    वो सपना...
    मैंने सहेज रखा है...


    मीत साहब। दिल को छू जाए, ऐसी अभिव्यक्ति है आपके शब्दों में। बहुत गहराई। बहुत ही बढिय़ा।



  14. सहेजा तो और भी बहुत कुछ है मीत ने
    पर वो सपना नहीं सच्‍चाई है जिसे बतलाने की घड़ी अभी नहीं आई है।


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