4:26 PM
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by मीत
गोबर से लिपे हुए आंगन नहीं दिखते..
गाँव के पास अब हाट नहीं लगते..
न कहीं, पेड़ों पे आम की बौर है.
न नदी के पानी का मध्यम सा शोर है.
वो चिमटा, वो फूकनी, वो चूल्हा कहाँ है?
अब तो बस पेट्रोल और डीजल का धुआं है.
डाली पे अब कहीं झूले नहीं टांगते..
गाँव के पास अब हाट नहीं लगते..
चौपाल पे हुक्कों की गुड़गुड़ नहीं है.
अम्मा के हांथो की गर्मी नहीं है.
पाठशाला की घंटी की टन टन कहाँ है?
अब तो के-बोर्ड की टक-टक जवान है.
रामू और गीता अब तितली नहीं पकड़ते..
गाँव के पास अब हाट नहीं लगते..
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11:56 AM
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by मीत
आज बहुत दिनों बाद आना हुआ. ब्लॉग से कुछ दिनों के लिए नाता ही टूट गया था... पर फिर अचानक एक अंजान दोस्त की मेल आई और खींच लायी मुझे फिर यहीं... एक छोटी सी कल्पना या फिर सच जो भी है? आपकी नज़र है... उम्मीद है पसंद आये...
तुम्हारा मीत
टिमटिमा पाते नहीं ये,
धुंध इन पर चढ़ रही है,
दिखती नहीं, धरती से अब तो,
चमक इनकी लगी है खोने..
आ गगन पर पहुंचा हूँ मैं,
घिसने को तारों के कोने..
तपन सूरज की बढ़ रही है,
चाँद की ठंडक से अड़ रही है,
आग सी फैली है फिजा में,
कैसे कोई जायेगा सोने..
आ गगन पर पहुंचा हूँ मैं,
घिसने को तारों के कोने..
द्रोपदियां यूँ मर रही हैं,
दुश्शासनो से लड़ रही हैं,
क्यों नहीं आता कोई कृष्ण,
कंसों को फिर से मिटाने..?
आ गगन पर पहुंचा हूँ मैं,
घिसने को तारों के कोने..
----मीत----
* फोटो punchstock.com के सोजन्य से.
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12:09 PM
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by मीत
इस गड्तंत्र दिवस पर तू बहुत याद आया, परेड में तेरे कदमों के निशां थे, आवाज थी पर तू नहीं था.. जहाँ भी रहे खुश रहे... love u...
तुम गुजर के जा चुके,
ना गम की गुजरती रात है...
हर तरफ अब ज़िन्दगी में,
दर्द का अलाप है...
मिट नहीं रहा है अबतक,
अनछुआ एहसास है...
मन के वीरान रास्तो पर,
बसी तेरी पदचाप है...
मिटती नहीं है, लाख मिटाऊँ!
अमिट ये तेरी छाप है...
तारों जितना दूर है तू,
फिर भी लगता है पास है...
---मीत
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12:16 PM
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by मीत
यह कविता १९९४-९५ में मेरे शहीद भाई के मेरठ स्थित आर्मी स्कूल की वार्षिक किताब प्रतिभा में छपी थी... तब उसने मुझे वो किताब भेंट दी थी... यह कविता किसी नीलम जी ने लिखी है...जो उस समय छठी कक्षा में पढ़ती थी... जो में आप सबसे बाँट रहा हूँ..
खास कर यह मैंने श्री गौतम राजरिशी जी के लिए डाली है... हम बीते साल को अलविदा कह रहे हैं. लेकिन इस बीते साल को हमारे लिए खुशनुमा बनाने वाले बहुत सारे ऐसे शहीद हैं जो अपने घर लौट के नहीं आये... और बहुत से अभी भी सरहद पर तैनात हैं केवल और केवल हमारी रक्षा के लिए... उन सभी को मेरी तरफ से ढेर सारी दुआएं...
साथी घर जाकर मत कहना...
साथी घर जाकर मत कहना...
यदि हाल मेरी माँ पूछे तो
जलता दिया बुझा देना
इतने पर भी ना समझे
तो मुरझाया फूल दिखा देना
साथी घर जाकर मत कहना...
साथी घर जाकर मत कहना...
यदि हाल मेरी बहना पूछे
धागा तोड़ दिखा देना
इतने पर भी ना समझे
तो सब कुछ समझा देना
साथी घर जाकर मत कहना...
साथी घर जाकर मत कहना...
यदि हाल मेरी पत्नी पूछे तो
मांग का सिंदूर मिटा देना
यदि इतने पर भी न समझे
तो कंगन तोड़ दिखा देना
साथी घर जाकर मत कहना...
साथी घर जाकर मत कहना...
नीलम कुमारी
६ अ
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2:46 PM
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by मीत
ज़िन्दगी सपनों के टुकड़े ले, सिरहाने पे रोती है...
घिस रहा बदन, घाव भरता नहीं
रिस रहा आँखों से, लहू रुकता नहीं
उधड़ने लगे हैं, अब ज़िन्दगी के पैबंद,
सीयू इनको तो चुभन होती है...
ज़िन्दगी सपनों के टुकड़े ले, सिरहाने पे रोती है...
सांस गरल बन सीने में थमीं,
सूखती नहीं अब आँखों की नमीं
ज़हर से कड़वे हैं, सच जीवन के,
पियूं इनको तो घुटन होती है...
ज़िन्दगी सपनों के टुकड़े ले, सिरहाने पे रोती है...
दिल का टुकड़ा खोया कहीं
ढूंढने को छानी है सारी जमीं
पाने को अब कुछ दिल नहीं करता
ये पाती कुछ नहीं सिर्फ खोती है,
ज़िन्दगी सपनों के टुकड़े ले, सिरहाने पे रोती है...
**मीत**
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