तोड़ के सूरज का टुकड़ा, ओप में ले आऊं मैं! हो जलन हांथों में, तो क्या! कुछ अँधेरा कम तो हो. -मीत

मन से निकले मुक्तक...

वैसे तो मुक्तक क्या है, उसकी परिभाषा क्या है.. नहीं जानता... बस लिखने को मन किया तो मन के भावों को ही शब्दों में उडेल दिया... उम्मीद करता हूँ आपको पसंद आये... गलतियाँ हों तो जानने की इच्छा रखता हूँ, ताकि सुधार सकूँ...
1

ज़िन्दगी की हर रात को स्वर दिया है
मन-आँगन को गीतों से भर लिया है
गुनगुना रहा हूँ मैं अब प्रेम-गीत
प्रेम ने मन में मेरे घर किया है. 


2

  ना मालूम किस ओर जा रहा हूँ
कौन सा सुख मैं पा रहा हूँ
क्या मैं ही आज का इंसान हूँ

नोच कर इंसानियत को खा रहा हूँ.

3


कलम मेरी फिर डगमगाई है
अपने लिए एक पड़ाव ले आई है
लिखना है कुछ, पर लिखता हूँ कुछ
आज फिर से उंगलियाँ थरथराई हैं. 


4

प्रीत की डोर में बाँध दिया मुझे
रिश्तों के सलीब पे टांग दिया मुझे
पास सिर्फ एक तन्हाई है
क्यों ऐसा जीवन वीरान दिया मुझे.


5

दूर कहीं अब चल पड़ा है मन
नए सफ़र पे निकल पड़ा है मन
टूट कर कहीं बिखर ना जाये
आप अपने से लड़ पड़ा है मन.


"मीत"



© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

रिश्तों के आँगन में मन, बिखरा पड़ा है...

 रिश्तों के आँगन में मन, बिखरा पड़ा है... 

प्रेम की अलमारी में, कब से इसे बंद किया था,
हर नाते की चाप को, मुस्कुरा के सह लिया था,
संबंधों की गठरी से, टुकडा-टुकडा कर गिर पड़ा है,

रिश्तों के आँगन में मन, बिखरा पड़ा है...

तकिया से मन को, कभी सराहने पे दबा लेता,
बिछौना बना ज़िन्दगी के पलंग पे कभी बिछा लेता,
आज ये ख्वाहिशों की लाठी बन, मुझसे लड़ चला है,

रिश्तों के आँगन में मन, बिखरा पड़ा है...

हाँथ है की, मजबूरियों की जेब में पड़े हैं,
मन के टुकडों को, हम कुचल के चल पड़े हैं,
अंजान प्रेयसी सा, मुहं फेर के पड़ा है,

रिश्तों के आँगन में मन, बिखरा पड़ा है...

                                          ---मीत
© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

झीनी-झीनी बारिश...

वो हर सुबह आते जाते लोगो को बारिश के लिए दुआ करते देख और सुन रहा था... हर तरफ लगभग एक ही जुमला सुनने को मिलता...हे भगवान तू कितना निर्दयी है?? क्या इस साल गर्मी से ही मार देगा... बात सही भी थी कितने ही दिन हुए थे, बारिश थी की आने का नाम ही नहीं ले रही थी. सावन निकलने को था लेकिन गर्मी से सुलग रही धरती पर बारिश की एक बूंद भी नहीं गिरी थी... उसे ख़ुशी थी की बारिश नहीं हो रही है... अच्छा है होनी भी नहीं चाहिए... उसे बहुत डर था की अगर कहीं ये बारिश हो गई तो उसके लिए बहुत मुश्किल हो जायेगी...इसलिए खुदा से हरदम बारिश ना होने की दुआ मांग रहा  था...
      और फिर एक रोज उसने खबर सुनी की फसल मर जाने की वजह से एक किसान ने आत्म-हत्या कर ली... वो डर गया... हर तरफ से उसके कानों में केवल एक ही आवाज़ पढ़ रही थी... सूखा... सूखा... सूखा... आखिर वो लोगो के दुःख के आगे हार गया और उसने भी अपने हाथ दुआ में उठाये और दुआ मांग ही डाली... दुआ में उसने वही माँगा जो उसे ना पसंद था... पानी...
      कहते हैं खुदा देर से सुनता है पर ये क्या उसकी आवाज़ पल भर में खुदा तक जा पहुंची... और सारी फिजा पानी से नहा गयी... तीन दिन से पानी लगातार बरस रहा था... उसका डर बढ़ गया था, दिल की धड़कने किसी सुपरफास्ट ट्रेन की तरह भाग रही थी... वो जल्दी से अपने घर पहुंचना चाहता था... तीन दिन से वोअपने घर से दूर था...
आखिर वो वो घर पहुंचा... देखते ही माँ उस से बोली देख बेटा भगवान् ने हमारी नहीं सुनी ना.. आखिर बारिश कर ही दी...  एक तो ये एक टूटा फूटा कमरा उस पर से लगातार होती ये झीनी-झीनी बारिश, सुना है यह बारिश बहुत खतरनाक होती है... इस बारिश की वजह से बड़े-बड़े मकान ढह जाते हैं... बेटा तीन दिन से घर की छत से पानी टपक रहा है... मैं ही जानती हूँ की तीन दिन से सारे बच्चों को किस तरह संभाले हूँ... कहीं हमारी छत भी गिर गई तो... तू ही बता ने ये बारिश बंद क्यों नहीं होती... अगर इस साल ना बरसता तो क्या हो जाता...??
     माँ के इतने सारे सवालों के आगे वो खामोश था... उसने आपने परिवार को बाहों में भरा और एक कोने में सिमट गया...पर उसकी बाहें छोटी थी...उसने आसमान की तरफ देखा... और मुस्कुरा दिया...आखिर उसी ने तो दुआ में मांगी थी यह बारिश...
खुदा तो हर किसी की सुनता है, यह तो और बात है की,
कहीं ऑंखें बरसती हैं, तो कहीं,
घर टपकता है...

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दिल तो खिलौना है

दिल तो खिलौना है,
आँखों को रोना है,
इस जहाँ में ना था कोई, अपना,
ना हम किसी के हैं,
ना किसी का होना है...
एक दोस्त बनाया था,
हँसना उसने सिखाया था,
भूल गए थे वो तो है इंसान,
हमने तो उसे,
भगवान के साथ बैठाया था...
रोंद के भावों को चल दिया वो,
बात आज ऐसी कह गया वो,
जिस्म की खराश तो मिटा लेते,
पर अफ़सोस तो यही है,
रूह को चाक-चाक कर गया वो...
---Evergreen Tumhara Uska Or Sabka मीत
(यह शब्द भी उसी ने कहे)
आज एक दोस्त ने कुछ ऐसी बाते कह दी की मन से ये शब्द निकल आये...
पर इश्वर से प्रार्थना करता हूँ वो हमेशा खुश रहे, उसके दुःख मुझे दे दे भगवान...

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मैंने वो सपना सहेज रखा है...

उनींदी स्याह रातों में...
रिश्तों की उलझी डोर से,
जिसे तुमने बुना था,
वो सपना...
मैंने सहेज रखा है...
हाँ वही सपना...!!
जो तुम्हें जान से प्यारा था..
वही सपना...
जो तुम्हारे मन का सहारा था...
पलकों की चादर फैंक,
आज ये कहीं उड़ जाना चाहता है...
जब रोकता हूँ इसको
तो घंटो छटपटाता है...
ना जाने देना इसको
तुमने ही तो कहा था,
पलकों के किनारे इसको
तुमने ही तो रखा था...
हाँ...देखो ना...
वो सपना
मैंने सहेज रखा है...
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