तोड़ के सूरज का टुकड़ा, ओप में ले आऊं मैं! हो जलन हांथों में, तो क्या! कुछ अँधेरा कम तो हो. -मीत

नयी सुबह

साँझ ढलने लगी है....
दिन के तपते हुए सूरज को,
रात धीरे-धीरे अपनी आगोश में ले रही है...
देखो न! सूरज का ये सिन्दूरी रंग दिल को कितना सकून पहुंचा रहा है...
माँ कहती हैं जब कभी तुम थक जाओ, तो ढलते हुए सूरज के सामने खड़े हो जाओ।
कितनी भी थकन हो उतर जायेगी...
मुझे ढलता सूरज देखना बहुत पसंद है।
कहने को तो ये सूरज ढल रहा है, लेकिन सिर्फ यहीं पर...
ये सूरज बेशक यहाँ ढल रहा है, लेकिन कहीं और यही सूरज उगने के लिए तैयार है
तैयार है एक नया सवेरा, एक नयी सुबह, एक नया दिन लाने को...
दूर क्षितिज पर ऐसे लगता है की जैसे सूरज धरती की गोद में समाता जा रहा है...
दुनिया कहती है की सूरज डूब रहा है, लेकिन इस बात से सब अंजान हैं की...
सूरज कभी नहीं डूबता।
क्योंकि उसका काम है बस रोशनी करना...
वो यहाँ डूबेगा, लेकिन कहीं और उदय होगा... क्योंकि उसे लानी ही है एक नयी सुबह...

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मेरी ज़िंदगी

क्या हुआ जो ज़िंदगी तमाम हो गई

जाते-जाते भी शीशे का जाम हो गई

आदत सी हो गई थी मदहोश रहने की

सीने में गम छिपा कर खामोश रहने की

क्या हुआ जो हस्ती मेरी बदनाम हो गई

जाते-जाते भी शीशे का जाम हो गई...

पीता था इस कदर की बेहोश हुआ जाता था

मेरे अपनों को मेरा गम कहाँ नज़र आता था

क्या हुआ जो बद्दुआ अपनों की मुझको इनाम हो गई

जाते-जाते भी शीशे का जाम हो गई...

टूटा जो दिल तो खनक उठी हर रात

हर रात को खामोशी ही मेरी कद्रदान हो गई

जाते-जाते भी शीशे का जाम हो गई...

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पहली नज़र

वो रहस्यमयी मुस्कानें, वो भेद भरी नज़रें

वो रह रह के उनका हँसना, वो चोटी में रिबन कसना...

वो मुड़-मुड़ के देख मुझको, नज़रों से नज़र मिलाना

मौसम पतझड़ का भी बसंत लग रहा है...

मुझे नींद नहीं आती, बेचैन हो गया हूँ

आंखें बंद करने की हिम्मत नहीं है मुझमें

ऑंखें बंद करके जो तस्वीर है मन में आती

उसमें वो हसीना दिखती है मुस्कुराती

ऐ खुदा ये मुहब्बत तो नहीं ?

या किसी के आकर्षण का बन्धन तो नहीं?

जो मुझसे मेरी नींदें चुराना चाहती है

मेरा दोस्त बनकर मुझको अपनाना चाहती है...

: नवीन

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तुम्हारी यादों के पल

वक्त जो कभी थमा ही नहीं, कभी रुका भी नहीं...

चलता रहा और चलता ही रहा।

लेकिन सच ये है की वक्त केवल आगे नहीं चलता पीछे भी कटता है।

कुछ कटे वक्त अब भी हैं मेरी ज़िंदगी के खलिहान में, जो तुम्हारी याद में तिल-तिल मर रहे हैं...

शायद तुमने खुदगर्ज बन वक्त को बहुत पीछे छोड़ दिया ...

और काफी लम्बा सफर तय कर लिया...

मैं तो जैसे पत्थर बन गया, हिला भी नहीं अपनी जगह से...

बरस गुजारना होता तो यूं गुजार देता,

युगों को अपनी पलकों से झपक के साथ ऐसे उतर फेकता जैसे कोई लम्हा हो...

पर इनका क्या करूं ?

तुम्हारी यादों के पल बडे ही बेरहम हैं ये...

युगों से भी लम्बे...

कमबख्त कटते ही नहीं हैं

अब तो रूह कटती जाती है...

मेरी ज़िंदगी बूंद-बूंद आँखों से टपक रही है...

जाने कब ये बारिश रुक जाये

और ज़िंदगी का ये सिलसिला भी थम जाये...

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मुलाकात


तुम तो कहतीं थी, मेरे द्वार खुले हैं हरपल

तुम्हारे लिए!

पर वहाँ एक ताला था।

मैं सीढियों पर बैठा करता रहा तुम्हारा इंतज़ार

१ घंटा दो घंटे विवश।

आखिर मैंने खिड़की से झाँका....

सुखा गुलाब का फूल, एक किताब, मोर पंख....

फिर हवा का एक तेज़ झोंखा आया और....

कुछ पन्ने फडफ्डाये ....

एक पन्ना उड़ चला, कुछ पुराना सा परिचित सा, पीला-पीला सा पन्ना....

मैंने सिर्फ अपना नाम पढा, मुस्कुराया

ताले पर नज़र डाली और गुनगुनाता हुआ...

चल पड़ा तुमसे मिला अच्छा लगा...

एक मुलाकात और जुड़ गयी यादों की...

तुम तो मुझे छोड़ कर चली गयीं पर....

में अब भी जिंदा हूँ....


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